क़िस्सा डायरी से- कृष्ण बलदेव वैद

'और मैं दो बूढ़े वैरागियों की तरह जीते चले जा रहे हैं। फ़र्क़ हम दोनों में यह है कि इस वैराग्य में भी व्यावहारिकता में उसकी दक्षता में कोई कमी नहीं होती, लेकिन मैं हमेशा इसमें अदक्ष रहा हूँ और अब और हो गया हूँ।' 

 यह उद्धरण हिंदी साहित्य के संजीदा अफ़साना निगार कृष्ण बलदेव वैद्य की डायरी से लिया गया है। इन्होंने अपनी डायरी में मानवीय और निजी संबंधों की बहुत सूक्ष्म अभिव्यक्ति की है। इस उद्धरण में उन्होंने अपनी पत्नी चम्पा के स्थायी और अनवरत नवीन प्रेम की व्यंजना की है। लेकिन लेखक यह भी स्वीकार करता है कि वह इस नैपुण्य में अदक्ष है। डायरी में इस तरह के अनेक वाक़या पढ़ने को मिल जाते हैं,  जिसके द्वारा पाठक को लेखक की निजी और अनसुनी आवाज़ को भी सुना जा सकता है।

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